फेसबुक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फेसबुक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 22 सितंबर 2010

सनातन धर्म मेरी नजर

सनातन धर्म --की स्थापना भगवान विष्णु जी ,अवतार रूप धारण कर करते हैं |अध्याय २ के अनुसार
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥
भावार्थ :  असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों को  ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है॥16॥ 
जो देखने में आया , आप भी देखें और विचारें 
                                  ईख 
                         ई से ईख   से ईश्वर 
ईख [गन्ना ]से उत्पति      क्यों की जिस तरहा ब्रह्मांडमांड की उत्पति ईश्वर से होती है    उसी प्रकार ईख की उत्पति देखें 
 ईख से गुड --; हिन्दू सनातन धर्म       एक ईश्वर के अतिरक्त और कुछ भी नही

 ईख से शकर --; मुस्लिम सनातन धर्म     ईश्वर रूपी खुदा के अतिरिक्त और कुछ भी नही

ईख से चीनी --; सिख सनातन धर्म   ईश्वर रूपी हरी अकाल पुरख

 ईख से बताशा --; इसाई सनातन धर्म   ईश्वर रूपी परमेश्वर 


जिस तरहा ईख से गुड शकर चीनी और बताशा उत्पन होते हैं उसी प्रकार ईश्वर से चार वेद ,चार दिशाएं , चार वर्ण , और चार सनातन धर्म , हिन्दू ; मुस्लिम ;सिख ; इसाई उत्पन होते जाने |गुड .चीनी .शकर. बताशा .; की उम्र लम्बी होती है ;इन को काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है ;परन्तु इन से उत्पन अन्य उत्पादों [ मिठाई और देह धारी गुरुओं; ]को लम्बे समय तक सुरक्षित नही रखा जा सकता |
गन्ना  अपने आप में ही ईश्वर की भाँती अविनाशी है इस का कोई बीज नही |यह खुद ही अपना बीज होता है |
ईश्वर की भाँती उपर से कठोर     भीतर से मुलायम     और मीठा होता है  |
मेरी नजर में सनातन धर्म ऐसा होता है  जो  एक  ईश्वर के अतिरिक्त और किसी भी साधन को स्वीकार ना करता हो , गने के पते [ धागे ,ताबीज ,यंत्र -मन्त्र ,; तन्त्र और भी ढेरों ] जड़ वगेरा वगेरा |

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

हिन्दू गुरु








 







श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं॥1॥ 
 
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
भावार्थ :  इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते॥2॥अद्याये ४ के २ श्लोक 
इन दोनों श्लोकों को यदि नजर अंदाज कर दिया जाए तो हमें तलाश होती हें किसी आध्यात्मिक गुरु की जो हमे ज्ञान की प्राप्ति करवा कर हमारा इस भवसागर से उधार करे   और हम जा फंसते हेँ किसी ढोंगी पाखंडी अज्ञानी मुर्ख देह धारी गुरु के चंगुल में और तमो गुण की ओर बड़ते ही जाते हैं |
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
भावार्थ :  हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है॥8॥ 
यदि हम इसी पर ध्यान दें तो श्री कृष्ण भी किसी आध्यात्मिक गुरु से कम नजर नही आते 
जिन का किसी भी काल में अंत नही होता | इस  लोक से परलोक तक सर्व व्यापक गुरु प्राप्त हो जाता हें | क्यों की भगवान खुद ही कह रहे हैं की
  ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं  |
यह तभी समझ में आता हें जब हमें भगवान के वचनों पर विश्वाश हो ओर तब  हमे  भगवान से बड़ा ज्ञानी इस धरती पर कोई ओर या उनके बराबर नजर ही नही  आये गा जो गारंटी ओर विश्वाश से कहता हो की मेरे इस ज्ञान का सहारा पाकर वह सभी मुनि जन इस संसार से मुक्त हो कर परम सीधी को प्राप्त हो चुके हेँ |
अतः इस के लिए अद्याये १८ 
 
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
भावार्थ :  सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो॥57॥   देखो
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
भावार्थ :  उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा॥58॥ 
 

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
भावार्थ :  इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥63॥

बुधवार, 1 सितंबर 2010

सिख धर्म

बुधवार, 18 अगस्त 2010

सनातन धर्म के संस्कार

सनातन धर्म के संस्कार



Om
ग्रन्थ
 श्रीमद्भगवद्गीता
 पुराण


HinduSwastika.svg

सनातन अथवा हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।
प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।
नामकरण के बाद चूडाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद विवाह संस्कार होता है। यह गृहस्थ जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू धर्म में स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सबसे बडा संस्कार है, जो जन्म-जन्मान्तर का होता है।
विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।
गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते हैं। इनमें पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ संस्कार तथा इसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते हैं। गर्भ संस्कार को दोष मार्जन अथवा शोधक संस्कार भी कहा जाता है। दोष मार्जन संस्कार का तात्पर्य यह है कि शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं। बाद वाले छह संस्कारों को गुणाधान संस्कार कहा जाता है। दोष मार्जन के बाद मनुष्य के सुप्त गुणों की अभिवृद्धि के लिये ये संस्कार किये जाते हैं।
हमारे मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये अपने अथक प्रयासों और शोधों के बल पर ये संस्कार स्थापित किये हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण भारतीय संस्कृति अद्वितीय है। हालांकि हाल के कुछ वर्षो में आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण सनातन धर्मावलम्बी अब इन मूल्यों को भुलाने लगे हैं और इसके परिणाम भी चारित्रिक गिरावट, संवेदनहीनता, असामाजिकता और गुरुजनों की अवज्ञा या अनुशासनहीनता के रूप में हमारे सामने आने लगे हैं।
समय के अनुसार बदलाव जरूरी है लेकिन हमारे मनीषियों द्वारा स्थापित मूलभूत सिद्धांतों को नकारना कभीश्रेयस्कर नहीं होगा।                                                                                                                                                          संस्कार


गर्भाधान संस्कार 

हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था।

 पुंसवन

गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। 
                                        सीमन्तोन्नयनhttp://mhabhart.blogspot.com/2010/08/blog-post_4166.html                               
सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

 जातकर्म

नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

 नामकरण

जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।
नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

 निष्क्रमण

दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।
निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। अन्नप्राशन
इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।
हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।

 चूड़ाकर्म

चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है।

 विद्यारम्भ

विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के समय शिशु बोलना भी शुरू नहीं कर पाता है और चूड़ाकर्म तक बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति जगने लगती है। इसलिये चूड़ाकर्म के बाद जब भी जन्म कुंडली में गुरु ग्रह की दशा आये तब ही   विद्यारम्भ संस्कार करना  उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

 कर्णवेध

हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।

 यज्ञोपवीत

यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।मन्त्रों को शिव ने कलयुग के आरम्भ में कील दिया था .मन्त्र बिना महूर्त बिना आसन बिना मन्त्र के योग्य भोजन एकाग्रता और जन्म कुंडली के योग्य -योग के बगेर निष्फल हो जाते हेँ |इसे अंतिम संस्कार करवाते समय महा ब्राह्मण स्वयम करवाता हें ,जिसे करना कलयुग में मनुष्य के लिए सुगम होता हें |
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था।अंतिम संस्कार में भी ग्रहस्थी जीव को सन्यासी जेसा बनाया जाता हें ,फिर दुबारा शुधि कर्ण के बाद ग्रहस्थ आश्रम में सम्लित कर लिया जाता हें जब की ऐसा सन्यास आश्रम में सम्भव ही नही हें | इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

 वेदारम्भ

ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत कापालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

केशान्त

गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

 समावर्तन

गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।यहाँ गुरु से विदाई अर्थात गुरु का त्याग और ग्रहस्थ आश्रम के नियमो का पालन स्वयम के बूते पर आरम्भ करना होता हें |

 विवाह

प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।                                                                                                                                            अंतिम संस्कार )
अन्त्येष्टि को अंतिम अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है।अंतिम संस्कार के बाद और कोई संस्कार नही हें और यह संस्कार जीवन  भर श्राद्ध बार्खी cwrkh के रूप में चलता रहता हें ,अतः अंतिम संस्कार अति आवश्यक संस्कार खसकते हेँ |  आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया होती है।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

सनातन धर्म के कुछ नियम लुप्त हो चुके हें जिन पर चर्चा होनी चाहिए|

http://www.facebook.com/group.php?gid=165105568657#!/profile.php?id=100000245806311

Gita Sharma

Gita Sharma सनातन धर्म के कुछ नियम लुप्त हो चुके हें जिन पर चर्चा होनी चाहिए ,,,,,,,,किसी भी युग में संसारी जीव में आस्था उसका पूजन और भजन मोह माया का बंधन रहा है |जिस से यह जीव मुक्त नही होता |कलयुग में राम नाम से बड़ा कोई जप भावों की शुद्धता से बड़ा कोई तप ईश्वर में सदेव ध्यान से बड़ा कोई व्रत नही ,जिस से यह जीव मुक्ति का अधिकारी हो जाता हे |

8 घंटे पहले · · Vij Singh naaaaaaaaa why r u do this ????????/5 घंटे पहले ·                              
  • Ramesh Mishra, Suresh Sharma, Rekha Sharma और 17 अन्य इसे पसन्द करते हैं .
    • Gita Sharma http://www.facebook.com/topic.php?topic=135&uid=133540549991116
      8 घंटे पहले · ·
    • Rasesh Rastogi you are right.. geetaji...sansaar mein koi bhi manushya mukta nahin ho sakta, jab tak uska man bhagwaan ki astha mein lagaa na rahe, tab tak uska man shudh ho jaayen..
      8 घंटे पहले · ·
    • Gita Sharma धन्यवाद रस्तोगी जी
      8 घंटे पहले · ·
    • Surat Rana यह सब मन की शान्ति के उपाय है खाली समय का सद उपयोग करने के लिये
      8 घंटे पहले · ·
    • Dilbagh Jakhar sahi hai
      8 घंटे पहले · ·
    • Pradeep Sharma surat ji tpniyan karna chod do.isi main balai hai
      8 घंटे पहले · ·
    • Gita Sharma ‎@Surat Rana @Dilbagh Jakhar जी मनकी शांति ही तो चाहिये जिस के लिए सनातन धर्म के यह नियम प्राय लुप्त नही होगये हैं ?कठिन से कठिन मार्गों को अपना कर कोण सा भला हो रहा हे ?
      8 घंटे पहले · · व्यक्तिRasesh Rastogi को यह पसंद है। ·
    • Gita Sharma ‎@Pradeep Sharma जी सुरत जी तिपनी करें गे तभी तो चर्चा आगे बड़े गी कृपया इन्हें अभी तो ना रोकें आप का धन्यवाद
      8 घंटे पहले · ·
    • Bharat Kanani achha hai
      7 घंटे पहले · ·
    • Dev Joshi i like
      7 घंटे पहले · ·
    • Satish Rawat jai shree ram..........
      7 घंटे पहले · ·
    • Jai Shukla MAI SANATAN DHARM K BARE M JANNA CHAHTA HU
      7 घंटे पहले · · व्यक्तिआपको यह पसंद है. ·
    • Varun Sharma haha
      6 घंटे पहले · ·
    • Vij Singh naaaaaaaaa why r u do this ????????/
      5 घंटे पहले · ·



 Sanjiv Vaidya( १)    हम   एक  भ्रम  में  जी  रहे  हैं ... और  लोगो  को  सत्य  चाहिए  भी  नह   उन्हें  तो  बस  सांत्वना  चाहिए  है ...सत्य  को  तो  हम  सूली  पे  लटका  देते  हैं ...साधो  संतो  ने  ये  जान  लिया ...और  कह  दिया  कलि  काल  हें  घोर  कलयुग  हें ... जैसे  पहले  कभी  एक ...हहा  समय  रहा  हो ...लेकिन  भ्रम  पैदा  किया  की  पहले  राम  राज्य  था  ... दूसरा  भ्रम  की  आगे  सतयुग  आएगा ... पर  ना  कभी  राम  राज्य  रहा  ना  कभी  सतयुग  आएगा ... तथाकथित  साधू  संत  अपनी  दुकान  चलने  क  लिए  ऐसा  बोलते  रहे ..भला  क्या  ये  भक्ति  हें  की  पत्थर  पर  फूल  माला  चदा  दी  और  पूजने  लगे ?    
   (2} खुद  का  बनाया  भगवन ..खुद  ही  सर  झुका  दिया  उसके  सामने ... इसका  नाम  भक्ति  हें ??                               (३)इस  से  सरल  और  क्या  हो  सकता  हें ??                                                                                                  
 (४)     कह  दिया  जपो  राम  नाम .. मुक्ति  मिलेगी ..लोग  खुश  बड़ा  आसान  काम  हो  गया ... जब  से  लोगो  के  चल  रहे  हैं  होंठ ..ह्रदय  को  खबर  ही  नहीं  है .....कोई  कही  नहीं  पहुंचा ...
इतनी  आसान  नह इ  है  भक्ति  इतना  आसान  नहीं  है  प्रेम  परमात्मा  से ...और  इन  झूठे  आयोजनों  से  तो  उपलब्ध  नहीं  होगा ..
आग  से  बिना  गुज़रे  नहीं  होगा  या ...तभी  तपकर  सोना  बनेगा ..और  प्रेम  से  बड़ी  आग  नहीं  है ...ये  आग  ही  है  जो  आत्मा  को  निखरेगी ..इसके  लिए  प्रेम  में  गिरना  पर्याप्त  नहीं  है ....प्रेम  में  होना  भी  पर्याप्त  नहीं  है  बल्कि  स्वयं  प्रेम  होना  होगा ..और  इसको  पाना  है  तो  मस्तिष्क  सइ  सारी  चेतना  ह्रदय  की  तरफ  प्रवाहित  होनी  चाहिए ...ये  सबसे  बड़ी  क्रांति  है ..हमे  मस्तिष्क  से  नहीं  ह्रदय  से  जीना  होगा .
4 घंटे पहले · ·
  • Bimal Surana जिव  परमात्मा  का  अंस  मने  टी  प्रकारी  का  क्या  महत  है .हम  अपनी  आत्मा  को  इस्वर  यानि  मूक  आत्मा  केसे  बनाये .इस्वर  से  मिलन  हो  कर  दुबारा  जनम  ना  लेना  परे .कर्मो  का  बंधन  ख़तम  हो  जाये 
    3 घंटे पहले · ·
  • Ram Rawat बिलकुल  सही  कहा  रे  गीता  तुमने ..
    2 घंटे पहले · ·
  • भगवान ने हमें इस धरती पर लाया कुछ कर्तव्यों का पालन, क्यों भाग जाओ. उसकी रचना, प्रेम, आनंद जी, खुशी और उसके लिए प्रतीक्षा करने के लिए वापस बुला बजाय अपने कार्य fullfilling भागने की कोशिश कर के बिना. मेरे विचार में मुक्ति पलायनवादी मानसिकता है.