शनिवार, 7 अगस्त 2010

शिवलिंग पूजा का महत्व

शिवलिंग पूजा का महत्व

श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,शंकर) की प्रतिमाओं में नित्य पूजन करना चाहिए क्योंकि शिव ही सबके मूल है, मूल (शिव)को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते है परन्तु सभी देवताओं को तृप्त करने पर भी प्रभू शिव की तृप्ति नहीं होती। यह रहस्य देहधारी सद्गुरू से दीक्षित व्यक्ति ही जानते है।
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"

प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )
(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )ना+रद =जिसकी कोई बात रद ना होती हो |
(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुॅचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )
(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।
(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते। प्रभू शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है। श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जॉंचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है। पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभू शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।
(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा। तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभू शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभू शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हॅूॅ।तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।
श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभू शिव की पूजा नहीं की जाती। महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)
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महिलाओं के लिये शिव पूजा

 

महिलाओं के लिये शिव पूजा

स्त्री को सबसे बड़ा सुख है - रूपवान, धनवान,बुद्धिमान और अनुकूल पति। सती जगदम्बा को सर्व गुण सम्पन्न और सृष्टि का मालिक भगवान शंकर ही पति रूप में मिल गए। प्रभु शिव ने भी लोग व्यवहार के अनुसार (आत्म चिन्तन छोड़कर) सती के साथ विहार करके उसे पूर्ण रूप से तृत्प किया। पूर्ण तृत्प होने पर सती जगदम्बा ने प्रभु शिव से प्रार्थना की ," हे नाथ ! आपने बहुत समय तक मेरे साथ विहार किया, उससे मैं प्रसन्न हॅू और मैरा मन उस ओर से निवृत्त हो गया है। अब मैं हे देवेश! हे हर!उस परम तत्व को आपसे जानना चाहती हॅू जिससे प्राणी शीघ्र ही संसार के दु:खों से पार हो जाये, जिसे करके विषयी जीव परम-पद को पाकर पुन: संसार में जन्म न ले सके। कृपा करके उस तत्व का आप वर्णन कीजिए।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखंड अध्याय २३श्लोक ४-९ पृष्ठ संख्या १९१)तब प्रभु शिव ने अपना गुप्त ज्ञान (शिव की नवधा भक्ति) सती जगदम्बा को दिया।...... भुक्ति-मुक्ति रूप फल को देने वाली मेरी भक्ति ब्रह्म-ज्ञान की माता है....भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है..... मेरी भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य उत्पन्न करती है, मुक्ति भी इसकी दासी बनी रहती है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण अध्याय श्लोक १२-४६ पृष्ठ संख्या १९२-१९३)

पार्वती जगदम्बा ने जन कल्याण के लिए प्रभु शिव से पूछा,"अजितेन्द्रिय तथा मन्दबुद्धि वालों के वश में आप कैसे हो सकते है ? "प्रभु शिव ने जो रहस्यमय उपदेश पार्वती को दिया, वह २४६७२ श्लोक वाले श्री शिव महापुराण के वायवीय संहिता उत्तर भाग के अध्याय १०-११ पृष्ठ ८९५-८९९ में देख सकते है।

इसमें प्रभु शिव ने कृपा करके ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रों के भी कर्तव्य दिये हैं। विधवा स्त्री का धर्म बताया है। प्रभु शिव ने वेद-पुराण दूसरों को पढाना, यज्ञ कराना और दान लेने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को दिया है, क्षत्रियों, वैश्यों को नहीं दिया। (श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११श्लोक १२ पृष्ठ ८९८) इसका स्पष्ट अर्थ है कि जो व्यक्ति, प्रभु शिव की इस आज्ञा को न मानकर,विरूद्ध कर्म करता है वह निश्चित मरकर नरक में जाता है।
- पति-पत्नी के धर्म क्या है? विवाह संस्कार देखें
- पति में क्या गुण होने चाहिए, पति को पत्नी की कैसे रक्षा करनी चाहिए?
- धर्म कर्म में कैसे सहायक होना चाहिए, इसका सम्पूर्ण ज्ञान वेद और पुराणों में दिया गया है।
- पतिव्रता पत्नी में क्या लक्षण होने चाहिए?
- पतिव्रता पत्नी कैसे अपने उद्धार के साथ पति और माता-पिता की तीन-तीन पीढ़ियों को तार सकती है? उसका वर्णन पार्वती खंड के अध्याय ५४ में वर्णित है।

प्रभु शिव की आज्ञा है कि "स्त्रियों के लिए पति सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यदि पति की आज्ञा हो तो वह मेरा (शिव) मूर्ति का पूजन करें।" जो स्त्री, पति की सेवा को छोड़कर व्रत करने लगती है, वह नि:सन्देह नरक को जाती है।(श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११ श्लोक १९-२० पृष्ठ ८९८)भारत में जन्मी स्त्रियों को इस ज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रभु शिव के इस आदेश के अनुसार महिलाओं को प्रभु शिव की मूर्ति पूजा  के अतिरिक्त और कोई अधिकार नहीं है।
भारत की नारियों को, प्रभु शिव की पूजा का अधिकार कब प्राप्त हो सकता है, उसके लिए आश्रम से सम्पर्क करें।अधिकांश महिलाएं पूजा में किस भंयकर गलती के कारण विधवा होकर मरती है(सुहागिन होकर नहीं मरती) इस आश्रम से मार्गदर्शन लें।
जब ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति (जिनकी ६० कन्याओं से इन्द्रादि लोकपाल उत्पन्न हुए) एक महान यज्ञ सत्ययुग में किया उस यज्ञ में सभी को बुलाया केवल एक संहारक शंकर जी को ही नहीं बुलाया। तब दक्ष की पुत्री सती जगदम्बा स्वयं कनखल में हो रहे यज्ञ-स्थल में आई और अपने पिता से बोली,...."जो महादेव की निन्दा करता है तथा निन्दा के वचनों को सुनता है, वे दोनों ही तब तक नरक गामी होते है जब तक चन्द्र और सूर्य रहते है... शिव ये दो अक्षरों वाला नाम जिन मनुष्यों की जीभ ने एक बार भी लिया है वह उनके समस्त पापों का नाश कर देता है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय २९ पृष्ठ संख्या २०४ से २०६)
महिलाओं को श्री शिव की पूजा बहुत शीघ्र फलवती हो जाती है। महानन्दा, चंचुला, पिंगला, शारदा, ऋषिका, आहुका आदि अनेक महिलाओं ने शिव भक्ति के प्रभाव से सद्गति प्राप्त की। कन्या में आत्मबल की वृद्धि,प्रभु शिव की (शिवलिंग में)पूजा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। ५ से ८ वर्ष की कन्या यदि सही सद्गुरू से दीक्षा लेकर शिव-पूजा करती है तो उससे आत्मबल भी बढ़ता है, इसी जन्म में राजपद् भी प्राप्त होता है और वह निश्चित रूप से कुल तारक संतान को ही उत्पन्न करेगी। शेष जीवन को सुधारने के लिए महिला आश्रम से नि:शुल्क सेवा प्राप्त कर सकती है।(यदि महिला कोई धन नहीं कमाती हो) स्कन्दपुराण में यादव कुल की राजकुमारी कलावती की कथा इसी जन्म में मुक्त होने के लिए, अगले जन्म में राजकुल प्राप्त करने के लिए या अगले जन्म में पुरूष रूप में जन्म लेने के लिए, आश्रम से अलग - अलग क्रियाएं सिखायी जाती है।
महिलाओं को जबभी कभी कोई कष्ट होता है तो वे देहधारी शिवभक्त सद्गुरू से दीक्षा लेकर, भगवान शंकर की शिवलिंग में पूजा (संकल्प करके ) करके शिवलिंग के सामने ही महानन्दा की कथा का पाठ बोलकर करती है। महानन्दा एक वैश्या थी और महान् शिवभक्ता थी। बिना तपस्या के ही महानन्दा को निष्कपट-भाव से श्रद्धा-भक्ति से शिवलिंग का पूजन,प्रभु शिव के व्रत करने तथा शिवभक्त ब्राह्मणों को दान देने से घर बैठे प्रभु शिव ने दर्शन दिये और महानन्दा के मॉंगने पर प्रभुशिव ने उसको उसके समाज सहित सभी को शिव-लोक प्रदान कर अतुल सुख दिया। यह कथा स्कन्द पुराण में महानन्दा के नाम से और श्री शिवमहापुराण के शतरूद्र संहिता के अध्याय २६ प्रभु शिव के वैश्यनाथ अवतार के नाम से वर्णित है। महिलाये विधि को आश्रम से सीख सकती है। अतिथी सत्कार की महिमा सभी धर्म शास्त्रों में वर्णित है। स्कन्द पुराण में वेश्या पिंगला का चरित्र और श्री शिवमहापुराण में आहुका का चरित्र (शतरूद्र संहिता अध्याय २८ में) अतिथी सत्कार में यदि किसी महिला ने एक बार भी शिवभक्त का सत्कार कर दिया, तो निश्चित रूप से भगवान शंकर स्वयं अगले जन्म में सद्गुरू रूप से उसे दीक्षा देकर उसकी सद्गति करते है। अतिथी सत्कार की विधि आश्रम से नि:शुल्क सिखायी जाती है।
आजकल कुछ कपटी लोगों ने एक भ्रामक प्रचार फैला रखा है कि स्त्रियों को शिवलिंग के स्पर्श एवं पूजन का अधिकार नहीं है। रूद्राक्ष और भ्रस्म त्रिपुण्ड़ लगाने का अधिकार नहीं है। विष्णु भक्तों को रूद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए, भस्म त्रिपुण्ड़ नहीं लगाना चाहिए, शिवलिंग का पूजन नहीं करना चाहिए, शिवजी का प्रसाद नहीं खाना चाहिए इत्यादि। वसिष्ठ की पत्नी अरून्धती जिसके दर्शन आज भी आकाशमण्डल के सप्तर्षि मण्ड़ल में होते हैं। यह अरून्धती पूर्व जन्म में ब्रह्मा की पुत्री सन्ध्या थी। सन्ध्या नेे गुरू वसिष्ठ से ऊॅं नम: शंकराय ऊॅं मंत्र की दीक्षा लेकर चार युगों तक हिमालय की चन्द्रभागा नदी के तट पर प्रभु शिव के लिए तपस्या की। ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया ने, अपने पति अत्रि के साथ प्रभु शिव की पूजा करके ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अंश से एक-एक पुत्र दुर्वासा, दत्तात्रेय और चन्द्रमा उत्पन्न किये। चंचुला ब्राह्मणी भ्रष्ट हो गई थी। उसने देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर शिवोपासना से सद्गति प्राप्त की। सूर्यवंशी राजा दशरथ की पत्नियॉं कौशल्या - सुमित्रा - कैकई ने शिव-पूजन से ही श्री विष्णु के अंश से चार पुत्र राम-लक्ष्मण- भरत-शत्रुघ्न प्राप्त किए। भारद्वाज गोत्र में उत्पन्न सुधर्मा ब्राह्मण की पुत्री घुष्मा ने शिवलिंग का पूजनकर बिना तपस्या के ही प्रभु शिव का साक्षात्कार कर लिया और उसके नाम से द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रसिद्ध घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग(एलोरा गुफा के समीप) विराजमान है।
हिमालय जो कि विष्णु का अंश है, उसके १०० पुत्र थे परन्तु वे सब से अधिक स्नेह अपनी पुत्री पार्वती से करते थे। राजा अनरण्य जिसने सफलतापूर्वक १०० यज्ञ किए थे। देवता उसे इन्द्रपद प्रदान कर रहे थे परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। उसके भी सौ पुत्र थे। राजा अनरण्य सौ पुत्रों से भी अधिक स्नेह अपनी पुत्री पद्मा से करते थे। कन्या संतान भी कुलतारक होती है।


महिलाओं के लिये शिव पूजा

महिलाओं के लिए
 

महिलाओं के लिये शिव पूजा

स्त्री को सबसे बड़ा सुख है - रूपवान, धनवान,बुद्धिमान और अनुकूल पति। सती जगदम्बा को सर्व गुण सम्पन्न और सृष्टि का मालिक भगवान शंकर ही पति रूप में मिल गए। प्रभु शिव ने भी लोग व्यवहार के अनुसार (आत्म चिन्तन छोड़कर) सती के साथ विहार करके उसे पूर्ण रूप से तृत्प किया। पूर्ण तृत्प होने पर सती जगदम्बा ने प्रभु शिव से प्रार्थना की ," हे नाथ ! आपने बहुत समय तक मेरे साथ विहार किया, उससे मैं प्रसन्न हॅू और मैरा मन उस ओर से निवृत्त हो गया है। अब मैं हे देवेश! हे हर!उस परम तत्व को आपसे जानना चाहती हॅू जिससे प्राणी शीघ्र ही संसार के दु:खों से पार हो जाये, जिसे करके विषयी जीव परम-पद को पाकर पुन: संसार में जन्म न ले सके। कृपा करके उस तत्व का आप वर्णन कीजिए।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखंड अध्याय २३श्लोक ४-९ पृष्ठ संख्या १९१)तब प्रभु शिव ने अपना गुप्त ज्ञान (शिव की नवधा भक्ति) सती जगदम्बा को दिया।...... भुक्ति-मुक्ति रूप फल को देने वाली मेरी भक्ति ब्रह्म-ज्ञान की माता है....भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है..... मेरी भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य उत्पन्न करती है, मुक्ति भी इसकी दासी बनी रहती है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण अध्याय श्लोक १२-४६ पृष्ठ संख्या १९२-१९३)

पार्वती जगदम्बा ने जन कल्याण के लिए प्रभु शिव से पूछा,"अजितेन्द्रिय तथा मन्दबुद्धि वालों के वश में आप कैसे हो सकते है ? "प्रभु शिव ने जो रहस्यमय उपदेश पार्वती को दिया, वह २४६७२ श्लोक वाले श्री शिव महापुराण के वायवीय संहिता उत्तर भाग के अध्याय १०-११ पृष्ठ ८९५-८९९ में देख सकते है।

इसमें प्रभु शिव ने कृपा करके ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रों के भी कर्तव्य दिये हैं। विधवा स्त्री का धर्म बताया है। प्रभु शिव ने वेद-पुराण दूसरों को पढाना, यज्ञ कराना और दान लेने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को दिया है, क्षत्रियों, वैश्यों को नहीं दिया। (श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११श्लोक १२ पृष्ठ ८९८) इसका स्पष्ट अर्थ है कि जो व्यक्ति, प्रभु शिव की इस आज्ञा को न मानकर,विरूद्ध कर्म करता है वह निश्चित मरकर नरक में जाता है।
- पति-पत्नी के धर्म क्या है?
- पति में क्या गुण होने चाहिए, पति को पत्नी की कैसे रक्षा करनी चाहिए?
- धर्म कर्म में कैसे सहायक होना चाहिए, इसका सम्पूर्ण ज्ञान वेद और पुराणों में दिया गया है।
- पतिव्रता पत्नी में क्या लक्षण होने चाहिए?
- पतिव्रता पत्नी कैसे अपने उद्धार के साथ पति और माता-पिता की तीन-तीन पीढ़ियों को तार सकती है? उसका वर्णन पार्वती खंड के अध्याय ५४ में वर्णित है।

प्रभु शिव की आज्ञा है कि "स्त्रियों के लिए पति सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यदि पति की आज्ञा हो तो वह मेरा (शिव) पूजन करें।" जो स्त्री, पति की सेवा को छोड़कर व्रत करने लगती है, वह नि:सन्देह नरक को जाती है।(श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११ श्लोक १९-२० पृष्ठ ८९८)भारत में जन्मी स्त्रियों को इस ज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रभु शिव के इस आदेश के अनुसार महिलाओं को प्रभु शिव की उपासना के अतिरिक्त और कोई अधिकार नहीं है।
भारत की नारियों को, प्रभु शिव की पूजा का अधिकार कब प्राप्त हो सकता है, उसके लिए आश्रम से सम्पर्क करें।अधिकांश महिलाएं पूजा में किस भंयकर गलती के कारण विधवा होकर मरती है(सुहागिन होकर नहीं मरती) इस आश्रम से मार्गदर्शन लें।
जब ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति (जिनकी ६० कन्याओं से इन्द्रादि लोकपाल उत्पन्न हुए) एक महान यज्ञ सत्ययुग में किया उस यज्ञ में सभी को बुलाया केवल एक संहारक शंकर जी को ही नहीं बुलाया। तब दक्ष की पुत्री सती जगदम्बा स्वयं कनखल में हो रहे यज्ञ-स्थल में आई और अपने पिता से बोली,...."जो महादेव की निन्दा करता है तथा निन्दा के वचनों को सुनता है, वे दोनों ही तब तक नरक गामी होते है जब तक चन्द्र और सूर्य रहते है... शिव ये दो अक्षरों वाला नाम जिन मनुष्यों की जीभ ने एक बार भी लिया है वह उनके समस्त पापों का नाश कर देता है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय २९ पृष्ठ संख्या २०४ से २०६)
महिलाओं को श्री शिव की पूजा बहुत शीघ्र फलवती हो जाती है। महानन्दा, चंचुला, पिंगला, शारदा, ऋषिका, आहुका आदि अनेक महिलाओं ने शिव भक्ति के प्रभाव से सद्गति प्राप्त की। कन्या में आत्मबल की वृद्धि,प्रभु शिव की (शिवलिंग में)पूजा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। ५ से ८ वर्ष की कन्या यदि सही सद्गुरू से दीक्षा लेकर शिव-पूजा करती है तो उससे आत्मबल भी बढ़ता है, इसी जन्म में राजपद् भी प्राप्त होता है और वह निश्चित रूप से कुल तारक संतान को ही उत्पन्न करेगी। शेष जीवन को सुधारने के लिए महिला आश्रम से नि:शुल्क सेवा प्राप्त कर सकती है।(यदि महिला कोई धन नहीं कमाती हो) स्कन्दपुराण में यादव कुल की राजकुमारी कलावती की कथा इसी जन्म में मुक्त होने के लिए, अगले जन्म में राजकुल प्राप्त करने के लिए या अगले जन्म में पुरूष रूप में जन्म लेने के लिए, आश्रम से अलग - अलग क्रियाएं सिखायी जाती है।
महिलाओं को जबभी कभी कोई कष्ट होता है तो वे देहधारी शिवभक्त सद्गुरू से दीक्षा लेकर, भगवान शंकर की शिवलिंग में पूजा (संकल्प करके ) करके शिवलिंग के सामने ही महानन्दा की कथा का पाठ बोलकर करती है। महानन्दा एक वैश्या थी और महान् शिवभक्ता थी। बिना तपस्या के ही महानन्दा को निष्कपट-भाव से श्रद्धा-भक्ति से शिवलिंग का पूजन,प्रभु शिव के व्रत करने तथा शिवभक्त ब्राह्मणों को दान देने से घर बैठे प्रभु शिव ने दर्शन दिये और महानन्दा के मॉंगने पर प्रभुशिव ने उसको उसके समाज सहित सभी को शिव-लोक प्रदान कर अतुल सुख दिया। यह कथा स्कन्द पुराण में महानन्दा के नाम से और श्री शिवमहापुराण के शतरूद्र संहिता के अध्याय २६ प्रभु शिव के वैश्यनाथ अवतार के नाम से वर्णित है। महिलाये विधि को आश्रम से सीख सकती है। अतिथी सत्कार की महिमा सभी धर्म शास्त्रों में वर्णित है। स्कन्द पुराण में वेश्या पिंगला का चरित्र और श्री शिवमहापुराण में आहुका का चरित्र (शतरूद्र संहिता अध्याय २८ में) अतिथी सत्कार में यदि किसी महिला ने एक बार भी शिवभक्त का सत्कार कर दिया, तो निश्चित रूप से भगवान शंकर स्वयं अगले जन्म में सद्गुरू रूप से उसे दीक्षा देकर उसकी सद्गति करते है। अतिथी सत्कार की विधि आश्रम से नि:शुल्क सिखायी जाती है।
आजकल कुछ कपटी लोगों ने एक भ्रामक प्रचार फैला रखा है कि स्त्रियों को शिवलिंग के स्पर्श एवं पूजन का अधिकार नहीं है। रूद्राक्ष और भ्रस्म त्रिपुण्ड़ लगाने का अधिकार नहीं है। विष्णु भक्तों को रूद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए, भस्म त्रिपुण्ड़ नहीं लगाना चाहिए, शिवलिंग का पूजन नहीं करना चाहिए, शिवजी का प्रसाद नहीं खाना चाहिए इत्यादि। वसिष्ठ की पत्नी अरून्धती जिसके दर्शन आज भी आकाशमण्डल के सप्तर्षि मण्ड़ल में होते हैं। यह अरून्धती पूर्व जन्म में ब्रह्मा की पुत्री सन्ध्या थी। सन्ध्या नेे गुरू वसिष्ठ से ऊॅं नम: शंकराय ऊॅं मंत्र की दीक्षा लेकर चार युगों तक हिमालय की चन्द्रभागा नदी के तट पर प्रभु शिव के लिए तपस्या की। ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया ने, अपने पति अत्रि के साथ प्रभु शिव की पूजा करके ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अंश से एक-एक पुत्र दुर्वासा, दत्तात्रेय और चन्द्रमा उत्पन्न किये। चंचुला ब्राह्मणी भ्रष्ट हो गई थी। उसने देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर शिवोपासना से सद्गति प्राप्त की। सूर्यवंशी राजा दशरथ की पत्नियॉं कौशल्या - सुमित्रा - कैकई ने शिव-पूजन से ही श्री विष्णु के अंश से चार पुत्र राम-लक्ष्मण- भरत-शत्रुघ्न प्राप्त किए। भारद्वाज गोत्र में उत्पन्न सुधर्मा ब्राह्मण की पुत्री घुष्मा ने शिवलिंग का पूजनकर बिना तपस्या के ही प्रभु शिव का साक्षात्कार कर लिया और उसके नाम से द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रसिद्ध घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग(एलोरा गुफा के समीप) विराजमान है।
हिमालय जो कि विष्णु का अंश है, उसके १०० पुत्र थे परन्तु वे सब से अधिक स्नेह अपनी पुत्री पार्वती से करते थे। राजा अनरण्य जिसने सफलतापूर्वक १०० यज्ञ किए थे। देवता उसे इन्द्रपद प्रदान कर रहे थे परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। उसके भी सौ पुत्र थे। राजा अनरण्य सौ पुत्रों से भी अधिक स्नेह अपनी पुत्री पद्मा से करते थे। कन्या संतान भी कुलतारक होती है।
http://www.vedpuran.com/listenpuran_shiv.asp 

शैव

शैव एक ऐसी परम्परा है जिसमें भक्त शिव परम्परा से बन्धा हो । यह प्राचीन काल में दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई थी ।
 श्रुति: वेद · उपनिषद · शिवागम,शिवशरण वचन स्मृति: इतिहास (वीरशैवपूराण, शिवपूराण, शिवगीता) · पुराण · सूत्र · आगम (तन्त्र, यन्त्र) · वेदान्त विचार अवतार · आत्मा · जंगम · धर्म · कर्म · मोक्ष · माया · इष्ट-देव · मूर्ति · पुनर्जन्म · संसार · तत्त्व · त्रिमूर्ति · गुरु दर्शन: मान्यता · प्राचीन वीरशैव धर्म · भक्तस्थल · महेशस्थल · लिंगस्थल · प्राण्स्थल ·शरणस्थल · जंगमस्थल · तन्त्र · भक्ति परम्परा: गुरु · लिंग · जंगम · पादोद्क · प्रसाद · विभूति · रुद्राक्षि · मंत्र · सत्संग · स्तोत्र · विवाह · गुरु: रेणुकाचार्य · बसवेश्वर · पंडिताचार्य · अल्लमप्रभु · सिद्धरामेश्वर · विभाजन: वीरशैव · शैव · नायनार· आराध्या देवता: भगवान शिव नाम ·शिव कथा युग: सत्य युग · त्रेता युग · द्वापर युग · कलि युग --59.92.171.12 ०९:५५, २० भाद्रपदाश्विने २००८ (UTC)श्री शिवानंद शिवाचार्य शिवाद्भैत मठ बाळुर ता|| भाल्कि जि|| बीदर (कर्नाटक)

शिवलिंग पूजा का महत्व

श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,शंकर) की प्रतिमाओं में नित्य पूजन करना चाहिए क्योंकि शिव ही सबके मूल है, मूल (शिव)को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते है परन्तु सभी देवताओं को तृप्त करने पर भी प्रभू शिव की तृप्ति नहीं होती। यह रहस्य देहधारी सद्गुरू से दीक्षित व्यक्ति ही जानते है।
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"

प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )
(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )
(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुॅचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )
(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।
(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते। प्रभू शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है। श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जॉंचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है। पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभू शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।
(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा। तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभू शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभू शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हॅूॅ।तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।
श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभू शिव की पूजा नहीं की जाती। महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

वैष्णव का अर्थ

वैष्णव का अर्थ 

भगवान विष्णु को ईश्वर मानने वालों का सम्प्रदाय।
ज्यादातर लोग धर्म के नाम पर संकीर्णता को बढावा देते है । अपना मनपसंद संप्रदाय ( राधास्वामी  ,निरंकारी ,,ओशो आर्य समाज मिशन या धर्म गुरुओं की जमात कोही ही सच्चा, सर्वश्रेष्ठ मानलेते हेँ  और दूसरे सब धर्म या संप्रदाय निरर्थक व निकम्मे है ऐसी विचारधारा वाले लोगों की संख्या कम नहीं है । एक तरह से देखा जाय तो ऐसे लोग नाना मनुष्यों के बीच भेदभाव की कृत्रिम दिवार खडी कर देते हैं और धर्म या संप्रदाय के नाम पर , बहस, असहिष्णुता, वैर-द्वेष, विरोध व घर्षण पैदा कर देते है । ऐसे लोग अपने आपको तो हानि पहुँचाते ही है पर साथ ही जिस समाज में वे रहते है उसको भी हानि पहुँचाते है । वे तो बदनाम होते ही हैं, साथ में उनका धर्म भी बदनाम होता है । वे यह भूल जाते हैं कि सच्चा धर्म इन्सान को सच्चे अर्थ में  सनातन पुरातन धर्म में ही शिहू रूप में इन्सान बनाता है । वही बाप दादाओं और पूर्वजों का धर्म हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई  उसे समभावी व विशाल हृदय संपन्न मानव बनाता है । वह उसमें विवेक की ऐसी ज्योत जगाता है जिसके आलोक में वह सब प्रकार की कटुता व पूर्वग्रहों को खत्म कर देता है ।
ऐसे ज्ञानी पुरुष कभी मिल जाते है पर वे विरले होते है । जब उनसे मिलाप होता है तो हमारे अंतर में अकथ्य आनंद का अनुभव होता है और ऐसा प्रतीत हुए बिना नहीं रहता कि आज भी संसार में सच्चे मानव साँस ले रहे है । जगत में जो थोडी शांति या सुखानुभूति दृष्टिगत होती है वह ऐसे सज्जन सत्वगुण-संपन्न मनुष्यों पर आधारित है । हमारी पृथ्वी पर के ऐसे मानव-देवता को देख मन-मयूर नाच उठता है 

                                                                                                            

सनातन धर्म 1

सनातन धर्म वेद काल में भारत के धर्म के लिये नाम मिलता है। सनातन का अर्थ है:- हमेशा, शाश्वत अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नद पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो स का उच्चारण ह करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू, और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व मिलता है।
प्राचीन काल में {भारतीय सनातनhttp://mhabhart.blogspot.com/2010/08/blog-post.html} धर्म मेंआज के युग में कुछ हानि भी हुई हे { http://mhabhart.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html     }{ वैष्णवhttp://mhabhart.blogspot.com/2010/08/blog-post_645.html, }शैव और शाक्त नाम के तीन सम्प्रदाय होते थे। वैष्णव विष्णु की, शैव शिव की और शाक्त शक्ति की पूजा आराधना किया करते थे। पर यह मान्यता थी कि सब एक ही सत्य की व्याख्या हैं। यह न केवल ऋग्वेद परन्तु रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है। प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनस्य बना रहता था। एकता बनाए रखने के उद्देश्य से धर्मगुरूओं ने लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त हैं। उनकी इन शिक्षाओं से तीनों सम्प्रदायों में मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, [फ्ग्फ्द्ग्[शिव]] और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद,पुराण,श्रुति,स्मृतियाँ,उपद्ग्निषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि संस्कृत भाषा में रचा गया है। कालान्तर में भारतवर्ष में मुसलमान शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की।http://wapedia.mobi/hi/%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE

कलयुग में सनातन

सनातन बहुत ही पुराना ब्रह्मांडीय इतिहास हें,सृष्टि के आरंभ में सनातन और हमारे जीवन को कुछ सिदंतो में बांधने के लिए /वेदों , पुराणों ,और शास्त्रों की रचना हुई ;जिनका रचयिता भगवन ही थे /वेद भगवान के ही रूप रहे /महाभारत के इतिहास में जानकारी प्राप्त हुई की प्रभु वेद जी लिखते रहे और भगवान गणेश जी लिखते रहे /आज्ञानी लोगों का जीवन विशेचिन्तन में और विद्वानों का शास्त्रावलोकन में बीत जाता हें /अपने-अपने सिधान्तों की पुष्टि करने वाले अनेकों अदभुतशास्त्र हें /वेदांत को सात्विक ,मीमांसा को राजस और न्याय को तामस शास्त्र कहा जाता हें /मनुष्य ,देवता,यक्ष ,राक्षस ,गन्धर्व,और किनर ,सबके -सब जिन कर्मो के फल द्वारा अपना उद्धार क्र सकते हें /इन्ही पवित्र पुस्तकों में विस्तार पूर्वक लिखा गया हें /जिन जीवों का धर्म में अनुराग था ,उन्हें सतयुग में जन्म मिला धर्म और अर्थ केअनुरागी त्रेता में धर्म -अर्थ -काम के प्रेमी द्वापर में और अर्थ-काम का प्रेमी इस कलयुग में पैदा हुए /प्राचीन युगों में जो राक्षस प्राणी रहे होंगे वह कलि के ब्राह्मण माने जाते हैं, क्योंकि प्रायः पाखंडी, दूसरो को ठगना, झूठ बोलना तथा वैदिक धर्म - कर्म से अलग रहना ,शूद्रों की सेवा में तत्पर रहना दम्भ करना, अभिमान में चूर रहना आज के कलयुगी ब्राह्मणों का स्वाभाविक गुण है /यही ब्राह्मण वेदों के निंदक हो चुके हैं /वे धर्म का ख़ुद पालन नही करते जिनको हमारे वेद-शास्त्रों ने भूमि का देवता माना है।

भरतीय सनातन

सनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए इसे प्रायः कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है. हालांकि, सच्चाई ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं. सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है. न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ. यह तो अनादि काल से प्रवहमान और विकासमान रहा. साथ ही यह केवल एक द्रष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता. कोई एक विचार ही सर्वश्रेष्ठ है, यह सनातन धर्म नहीं मानता। इसी वजह से इसमे कई सारे दार्शनिक सिद्धांत मिलते हैं. इसके खुलेपन की वजह से ही कई अलग-अलग नियम इस धर्म में हैं. इसकी यह नरमाई ही इस के पतन का कारण रही है, औ यही विशेषता इसे अधिक ग्राह्य और सूक्ष्म बनाती है. इसका मतलब यह है कि अधिक सरल दिमाग वाले इसे समझने में भूल कर सकते हैं. अधिक सूक्ष्म होने के साथ ही सनातन धर्म को समझने के कई चरण और प्रक्रियाएं हैं, जो इस सूक्ष्म सिद्धांत से पैदा होती हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सरल-सहज मस्तिष्क वाले इसे समझ ही नहीं सकते. पूरी गहराई में जानने के लिए भले ही हमें गहन और गतिशील समझदारी विकसित पड़े, लेकिन सामान्य लोगों के लिए भी इसके सरल और सहज सिद्धांत हैं. सनातन धर्म कई बार भ्रमित करनेवाला लगता है और इसके कई कारण हैं. अगर बिना इसके गहन अध्ययन के आप इसका विश्लेषण करना चाहेंगे, तो कभी समझ नहीं पाएंगे. इसका कारण यह कि सनातन धर्म सीमित आयामों या पहलुओं वाला धर्म नहीं है. यह सचमुच ज्ञान का समुद्र है. इसे समझने के लिए इसमें गहरे उतरना ही होगा. सनातन धर्म के विविध आयामों को नहीं जान पाने की वजह से ही कई लोगों को लगता है कि सनातन धर्म के विविध मार्गदर्शक ग्रंथों में विरोधाभास हैं. इस विरोधाभास का जवाब इसी से दिया जा सकता है कि ऐसा केवल सनातन धर्म में नहीं. कई बार तो विज्ञान में भी ऐसी बात आती है. जैसे, विज्ञान हमें बताता है कि शून्य तापमान पर पानी बर्फ बन जाता है. वही विज्ञान हमें यह भी बताता है कि पानी शून्य डिग्री से भी कम तापमान पर भी कुछ खास स्थितियों में अपने मूल स्वरूप में रह सकता है. इसका जो जवाब है, वही सनातन धर्म के संदर्भ में भी है. जैसे, विज्ञान के लिए दोनों ही तथ्य सही है, भले ही वह आपस में विरोधाभासी हों,और विज्ञान को झुठलाते हों उसी तरह सनातन धर्म भी अपने खुलेपन की वजह से कई सारे विरोधी विचारों को ख़ुद में समेटे रहता है.परन्तु सनातनधर्म में जो तत्व है, उसे नकारा भी तो नही जा सकता। हम पहले भी कह चुके हैं-एकं सत, विप्रा बहुधा वदंति-उसी तरह किसी एक सत्य के भी कई सारे पहलू हो सकते हैं. कुछ ग्रंथ यह कह सकते हैं कि ज्ञान ही परम तत्व तक पहुंचने का रास्ता है, कुछ ग्रंथ कह सकते हैं कि भक्ति ही उस परमात्मा तक पहुंचने का रास्ता है. सनातन धर्म में हर उस सत्य या तथ्य को जगह मिली है, जिनमें तनिक भी मूल्य और महत्व हो. इससे भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है. आप उसी रास्ते को अपनाएं जो आपके लिए सही और सहज हो. याद रखें कि एक रास्ता अगर आपके लिए सही है, तो दूसरे सब रास्ते या तथ्य ग़लत हैं, सनातन धर्म यह नहीं मानता. साथ ही, सनातन धर्म खुद को किसी दायरे या बंधन में नहीं बांधता है. ज़रूरी नहीं कि आप जन्म से ही सनातनी हैं. सनातन धर्म का ज्ञान जिस तरह किसी बंधन में नहीं बंधा है, उसी तरह सनातन धर्म खुद को किसी देश, भाषा या नस्ल के बंधन में नहीं बांधता. सच पूछिए तो युगों से लोग सनातन धर्म को अपना रहे हैं. सनातनधर्म के नियमों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो मन स्वयँ ही इसकी सचाई को मानने को तैयार हो जाता है. विज्ञान जिस तरह बिना ज्ञान के अधूरा है .सनातन धर्म भी बिना ज्ञान हानि कारक है. ज्ञान मनुष्य के आस-पास होता है.उसके भीतर होता है .इस का एक उदाहरण देखिये- हवन, यज्ञ आदि का शास्त्रों में कोई विधि विधान कहा गया है .कि इसे किस महूर्त में किस आसन पर बैठ कर किस प्रकार के भोजन का इस्तेमाल करते हुए करना चाहिए, इतना सा ज्ञान तो कुछ पेचीदा नही है . परन्तु इस ज्ञान के बिना किये गये हवन, यज्ञ हानि ही करेंगे, यह ज्ञान भी पेचीदा नही है .देखने सुनने में आता है कि अज्ञानी लोग प्रति दिन आर्यसमाज, मन्दिरों, घरों, में नित्य-नियम बनाकर हवन, यज्ञ आदि करते रहते हैं .जब अनिष्ट फल प्राप्त होता है .तब सनातन धर्म क़ी नरमाई का लाभ उठाते हुए सनातन धर्म का त्याग कर देते हैं, और इस पुरातन सनातन धर्म क़ी खामियाँ तलाशने लगते है जबकि सनातन धर्म अपने आप में सम्पूर्ण सत्य धर्म है .